जेल परिक्षेत्र डीआईजी को रहता सिर्फ लिफाफे का इंतजार!

दो गुना लगान वसूली के बाद भी नहीं करते निर्धारित कर्तव्यों का निर्वहन प्रभार संभालने के बाद भी नहीं करते जेलों का निरीक्षण

जेल परिक्षेत्र डीआईजी को रहता सिर्फ लिफाफे का इंतजार!
कारागार मुख्यालय

लखनऊ। कारागार विभाग में अधिकारियों के आए दिन अजब गजब कारनामे सामने आ रहे है। विभाग के जेल परिक्षेत्र में तैनात डीआईजी दो गुना लगान वसूलने के बाद भी निर्धारित दायित्वों का निर्वहन नहीं करते है। कानपुर जेल परिक्षेत्र के प्रभारी डीआईजी ने तो कमाल ही कर दिया। प्रभार संभालने के बाद उन्होंने आज तक ललितपुर जेल का निरीक्षण ही नहीं किया। डीआईजी की इस हीलाहवाली का लाभ उठाते हुए जेल में बंद पूर्व सांसद दो साल तक मौज करता रहा। इस सच का खुलासा विधिक सेवा प्राधिकरण के पदाधिकारियों के जेल निरीक्षण से हुआ। यह अलग बात है कि मामले का खुलासा होने के बाद छोटे कर्मियों को निपटाकर परिक्षेत्र डीआईजी ने बड़े अधिकारियों को बचा लिया गया। घटना ने डीआईजी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मिली जानकारी के मुताबिक जेल मैनुअल में विभाग के अधिकारियों के दायित्वों का निर्धारण कर रखा गया है। इसको लेकर समय समय पर शासन की ओर से निर्देश भी जारी किए जाते है। सूत्रों का कहना है कि मैनुअल और शासन के जारी निर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है जेल परिक्षेत्र डीआईजी परिक्षेत्र के अंतर्गत आने वाली प्रत्येक जेल का दो से तीन माह के अंतराल में विधिवत निरीक्षण कर निरीक्षण रिपोर्ट विभागाध्यक्ष को भेजेगा।

एक अधिकारी दो जिम्मेदारी तो कैसे होगी जेलों की निगरानी!
वर्तमान समय में कारागार विभाग में चार आईपीएस और तीन विभागीय डीआईजी तैनात है। आईपीएस डीआईजी में सुभाष शाक्य के पास डीआईजी मुख्यालय के साथ मेरठ जेल परिक्षेत्र का प्रभार है। इस प्रकार डीआईजी राजेश श्रीवास्तव के पास पुलिस विभाग के साथ प्रयागराज जेल परिक्षेत्र का भी प्रभार है। पुलिस डीआईजी कुंतल किशोर को बरेली परिक्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी गई है। एक आईपीएस प्रदीप गुप्ता की हाल ही में कारागार विभाग में तैनाती की गई है। विभागीय डीआईजी में प्रेमनाथ पांडे को आगरा जेल परिक्षेत्र के साथ कानपुर जेल परिक्षेत्र का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है। डीआईजी डॉ रामधनी को कारागार मुख्यालय के साथ लखनऊ परिक्षेत्र की जिम्मेदारी वहीं डीआईजी शैलेन्द्र मैत्रेय को सिर्फ अयोध्या जेल परिक्षेत्र की जिम्मेदारी ही सौंपी गई है। ऐसा तब है जब विभाग के प्रत्येक डीआईजी के पास दो दो जिम्मेदारियां हैं वहीं एक को सिर्फ एक परिक्षेत्र ही दिया गया है। उधर विभाग के आला अफसरों ने इसे शासन का मामला बताते हुए कोई भी टिप्पणी करने से मना कर दिया।

सूत्रों का कहना है कि प्रत्येक दो तीन माह के अंतराल के दौरान होने वाले निरीक्षण में परिक्षेत्र डीआईजी की जिम्मेदारी होती है कि वह बंदियों को वितरित होने वाले नाश्ते, दोपहर और शाम को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता की पड़ताल करे। इसके साथ ही बंदियों को मिलने वाली रोटी, सब्जी, दाल चावल इत्यादि का वजन कराए और यदि बंदियों को निर्धारित वजन से कम भोजन दिया जा रहा हो तो प्रभारी जेल अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करे। इसके अलावा विविध वस्तुओं (एम एस के) के तहत की गई खरीद फरोख्त के दामों की पड़ताल करने के साथ जेल में संचालित की जा रही कैंटीन में बिक रही खाद्य सामग्री के लिए खरीदी गई वस्तुओं के दामों की गहन पड़ताल कर इसकी रिपोर्ट विभागाध्यक्ष को पेश करे। सूत्रों का कहना है बंदियों के राशन में हो रही बेतहाशा कटौती, कैंटीन और एम एस के तहत मनमाने दामों पर हो रही खरीद फरोख्त को छिपाने के एवज में जेलों की ओर से परिक्षेत्र के डीआईजी को तोहफे के रूप में लिफाफा भेंट किया जाता। सूत्रों की माने तो परिक्षेत्र के डीआईजी ने लगान दो गुनी करने के बावजूद जेलों का निरीक्षण नहीं करते हैं।ललितपुर, फतेहगढ़, एटा जेल इसका जीता जागता उदाहरण बन गई है। इन जेलों में घटनाएं होने के बाद प्रभारी डीआईजी ने छोटे कर्मियों को निपटाकर बड़े अधिकारियों को बचा लिया। यही नहीं एटा जेल में भी पूर्व सांसद की तरह एक दबंग बंदी को वह वीआईपी सुविधाएं मुहैया करा रखी है जिनका नियमों में कोई प्रावधान ही नहीं है। यह मामला विभागीय अधिकारियों में चर्चा का विषय बना हुआ है। उधर इस संबंध में जब अपर महानिरीक्षक प्रशासन धर्मेंद्र सिंह से बात करने का प्रयास किया तो उन्होंने फोन ही नहीं उठाया।