अँजुरी भर हवा और थोड़ी-सी जमीन
हमें इस समाज में ऐसे कई उदाहरण रोजाना सुनने और देखने को मिलते है. जो सबको दिखाई तो स्पष्ट रूप से देते है लेकिन फिर भी हम कुछ नहीं कर पातें असहाय और बेबस नजर आते हैं. चाहें छोटी बच्ची हो, चाहे वो शादीशुदा हो या फिर कुंवारी, इस समाज में महिलाओं के साथ जो हो रहा है उसे समझने और दूर करने की जरूरत है. कब तक सहेगी नारी आखिर कब तक?
रोजमर्रा की भागती दौड़ती जिन्दगी में दिन-प्रतिदिन समस्याओं की रफ़्तार तब चुभने लगती है जब खासकर सिर्फ गृहिणी न होकर उसके साथ कई जिम्मेदारियां और आने वाली हर छोटी बड़ी समस्या सर उठाये खड़ी हो, जिसे बिना निपटाएँ वह आगे नहीं बढ़ सकती.
मुट्ठी भर आसमान, एक चुटकी धूप, अँजुरी भर हवा और थोड़ी-सी जमीन, जहाँ वह अपने कदमों को आत्मविश्वास के साथ रख सके। बस इससे अधिक तो कभी नहीं चाहा उसने l इन हालातों में नारी की सबसे कठिन परीक्षा की घड़ी होती है l सबसे पहले घर, फिर ऑफिस, बाजार और फिर सामाजिक इन सब जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते वह थक जाती है फिर भी वह ऊफ... तक नहीं करती.
देखा जाये तो हर नारी करीब-करीब इसी तरह की समस्याओं में घिरी होती है l फिर भी उसके मन में कुछ न कुछ करने की लगन, और कुछ नया-नया करने की चाह बनी रहती हैl और सही मायने में होना भी यही चाहिए l क्योंकि अपने आपको ऊर्जावान बनाए रखने के लिए यह सब करना बहुत जरूरी होता है l एक महिला दिवस आता है और हम अपने आपको समूचा उड़ेल देते हैं, नारों, भाषणों, सेमिनारों, आलेखों में बड़े-बड़े दावे और बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. लेकिन इतना सब करने के बाद भी परिवार और समाज में कुछ पुरुषवादी मानसिकता के व्यक्ति नारी का महत्व कहाँ समझ पाए है l
अब चाहें भले ही हम इस दिवस को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में घोषित करें और नारी जाति कितने ही मैडल कमा लें लेकिन समाज और परिवार में आज भी नारी के खिलाफ होने वाले अत्याचार, साजिश सब कुछ बखूबी जारी है l यथार्थ इतना क्रूर है कि कोई एक घटना तमाचे की तरह गाल पर पड़ती है और फिर नारी जाति बेबस, असहाय खड़ी रह जाती है l इन हालातों को देखते हुए नारियों की जिंदगी बहुत कशमकश में उलझी हुई हैं.
| इस संसार में नारी के लिए तो जन्म लेने से मृत्यु तक इसी सफर को तय करते हुए हर साल, हर दिन, हर पल, हर उम्र के बढ़ते उस दौर में भी परीक्षा की कठिन घड़ी से गुजरना होता है और हर परीक्षा को पार करके अपने जीवन की इस यात्रा को समाज, परिवार में सार्थक बनाने में ही अपना धर्म समझती है l जब हम 'फेमिनिस्ट' होते हैं तब जोश और संकल्पों से भरपूर होकर इस दुनिया को बदलने निकल पड़ते हैं l फिर उस दौर में हमें नहीं दिखाई देती अपने ही आसपास की सुबकतीं, सिसकतीं स्वयं को सँभालतीं खामोश स्त्रियाँ जो न जाने कितनी शोषित और पीड़ित की जातीं हैं इन व्यथित नारियों के मन की अथाह गहराइयों में दर्द के समुद्री शैवाल छुपे हुए हैं l कहाँ-कहाँ, कब-कब, और कैसे-कैसे छली गई हैं स्त्रियाँ ! इसका कोई हिसाब नहीं. |
अपने मन, कर्म और वचन से पूरी तरह बंधी होने के बावजूद भी प्रताड़ित की जाती हैं नारियाँ l आज भी नारियों पर अत्याचारों की श्रृंखलाएँ लदी हुई है l आज भी भावनात्मक, मानसिक, और सामाजिक- असामाजिक कुरीतियों, विकृतियों की शिकार नारियां होतीं है l सही मायने में कहा जाये तो सामाजिक ढाँचे में छटपटातीं, कसमसातीं नारियों की व्यथा को कोई देखना या सुनना पसंद नहीं करता l
नारी भले ही कितनी ही पढ़ लिख कर बड़े ओहदे पर पहुँच जाए, चाहें थोड़े समय के लिए समाज का नजरिया उसके प्रति बदल भी जाएँ तब भी और आज भी वह अत्याचारों से दबी हुई है l हमें इस समाज में ऐसे कई उदाहरण रोजाना सुनने और देखने को मिलते है l जो सबको दिखाई तो स्पष्ट रूप से देते है लेकिन फिर भी हम कुछ नहीं कर पातें असहाय और बेबस नजर आते हैं l चाहें छोटी बच्ची हो, चाहे वो शादीशुदा हो या फिर कुंवारी, इस समाज में महिलाओं के साथ जो हो रहा है उसे समझने और दूर करने की जरूरत है.
कब तक सहेगी नारी आखिर कब तक? चाहे वो अनपढ़ हो तब भी, कम पढ़ी-लिखी हो तब भी, और एक प्रोफेशनल नारी हो तब भी.....! यह नारियों के प्रति चलता आ रहा अन्याय का दौर कब खत्म हो पाएगा l नारियों ने हमेशा एक सुंदर, संस्कारित, उच्च मानवीय दृष्टिकोण वाला सभ्य परिवेश चाहा है अपने निश्छल मन की सहृदयता से नारियों को नैतिक संबल और सुअवसर दीजिए कि वह सिद्ध कर सकें अपने बहुमुखी व्यक्तित्व को और अपनी विशाल विशिष्टता को l नारी के मन में ये कभी नही आया कि अपने ही पूरक पुरुष को पछाड़कर खुश रहे, पुरुषों से आगे निकल जाना नारी का ध्येय नहीं है, नारी तो समाज में सिर्फ अपना वजूद चाहती है, एक ऐसा बजूद जो उसका अपना हो l जब नारी को कुछ देने की बात आती है, तो क्यों समाज कृपण और कंगाल हो जाता है, नारी ने हमेशा ही पृथ्वी पर आगमन करके सिर्फ और सिर्फ दिया ही है, लिया कुछ नहीं.
आज के दौर में समाज में नारी सिर्फ 'देह' समझी जाती है. नारी के सपनों को आकार ग्रहण करने से पहले ही बिखेर दिया जाता हैं, नारी के मन की अनुभूतियाँ छल-कपट का शिकार हो छटपटाती रह जाती हैं उसके होठों की मुस्कराहट कुकृत्य की कड़वाहट की कब्र में दफना दी जाती है जिससे नारी मन की महत्वाकांक्षा कैक्टस में परिवर्तित होकर हमेशा की तीखी चुभन बन जिन्दगी भर सालती रहती है l नारी को चाहिए ही क्या सिर्फ धूप की उजली किरण, खुला आसमान, अँजुरी भर हवा और थोड़ी-सी जमीन जिसमें उसके सपने पल सकें, जहाँ वह अपने कदमों को आत्मविश्वास के साथ रख सके, इस सामाज के विकारों को दूर कर सके l
- वैसे तो नारी समाज को देती बहुत कुछ है जब बच्चा पैदा होता है उसको पाल-पोश कर बड़ा करती है अच्छे संस्कार देती है तो फिर क्यों ?
- कुछ अधिक तो नहीं चाहा उसने, फिर क्यों उसके उत्थान के उज्ज्वल सूर्य को अर्घ्य देने में ये पुरुषवादी मानसिकता के व्यक्ति समाज में उसे वो स्थान नहीं देते जिसकी वो हक़दार है ?
- क्यों उसके विस्तार की धरा को उज्जवल करने में पुरुषवादी मानसिकता का समाज अपने हाथ पंगु कर लेता हैं ?
- और क्यों नारी के विराट और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के महत्व को स्वीकारने में सारा समाज संकीर्ण हो जाता है ?
- परिवर्तन की जरूरत सिर्फ महिलाओं के लिए ही नहीं है, परिवर्तन की जरूरत इस संकीर्ण समाज में है, व्यवस्थागत दुर्बलताओं में है, सामाजिक स्तर पर किए जाने वाले व्यवहार में है
देखा जाए तो भ्रूण हत्या से लेकर वृद्धावस्था की उपेक्षा तक स्त्री दमन का सच इतना विकृत है जिसकी कोई सीमा नहीं है l इन हालातों में महिला दिवस मनाना और एक दिन के लिए महिलाओं को खुश करके बाकी दिनों उन पर जुल्म करना, अत्याचार करना, तरह-तरह के उलाहने देकर जलील करते रहने कहाँ तक उचित है l और महिला दिवस के दिन की यह अपेक्षा होती है कि नारी-सफलता पर ध्यान केंद्रित किया जाए.
महिला दिवस मनाइए जरुर पर ये तो सोचिये कि उसकी सफलता कहाँ तक सार्थक है l जब प्रतिभापाटिल, सोनिया गाँधी और अन्य माननीय महिलाओं जैसी शख्सियत मुस्कुराते हुए दुनिया पर राज तो करती है पर बलात्कार जैसे घृणित कार्य को करने वाले अपराधी जब तमाम 'प्रभावों' का इस्तेमाल करने के बाद भी सलाखों के पीछे नजर नहीं आते है तो फिर नारी दिवस क्यों ? एक पीड़ित नारी फिर जंग हार जाती है महिला दिवस सही अर्थों में सार्थक तब होता है जब तमाम दलीलों और 'प्रभावों' का इस्तेमाल करने के बाद भी कोई व्यभिचारी सलाखों के पीछे चला जाता है और एक लड़ाई जीत ली जाती है....
हम सबको चाहिए कि सबसे पहले राजनीति के ठेकेदारों की चाभी से उस ताले को खोलना होगा जिसमें नारी जाति की अस्मिता टुकड़े-टुकड़े करके बांटी जाती है l नन्ही-नन्हीं बच्चियां अपने कोमल मन पर जब अघात सहती हैं तब इन ठेकेदारों को कोई मलाल नही होता, सब के सब कानों पर ऊँगली लगाकर चुप हो जाते हैं और शहर का मीडिया अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने और खबर के बहाने ही ख़बरों को 2 से तीन दिन तक सुर्ख़ियों में रखती है l फिर वही पुराना ढर्रा चलने लगता है.
फिर भी न जाने मन को एक उम्मीद बनी हुई है कि एक न दिन नारी के प्रति बह रही इस धारा को थाह मिलेगी.....
सुनीता दोहरे
प्रबंध सम्पादक / इण्डियन हेल्पलाइन न्यूज़
महिला अध्यक्ष / शराबबंदी संघर्ष समिति


